उत्तर प्रदेश

हाईकोर्ट का आदेश भी बेअसर? नगीना तहसील में तालाबों पर कब्जों को लेकर प्रशासन की कार्यशैली कटघरे में!

सरकारी तालाबों पर कब्जे, जिम्मेदारों की चुप्पी और कार्रवाई में कथित भेदभाव! आखिर कब जागेगा प्रशासन?

 

बिजनौर/नगीना। सरकारी तालाबों और ग्राम सभा की सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं, लेकिन नगीना तहसील में इन आदेशों के धरातल पर पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर न्यायालय के आदेशों के बावजूद सार्वजनिक संपत्तियों को कब्जामुक्त कराने में ढिलाई क्यों दिखाई दे रही है?

माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनहित याचिका संख्या **2923/2025, मनोज कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य** में 06 अक्टूबर 2025 को पारित आदेश में सरकारी और सार्वजनिक उपयोग की भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 67 तथा राजस्व संहिता नियमावली, 2016 के नियम 66 और 67 के प्रभावी अनुपालन पर जोर दिया था।

न्यायालय ने ग्राम प्रधान और लेखपाल की जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट किया था। अतिक्रमण की जानकारी निर्धारित प्रक्रिया के तहत संबंधित तहसीलदार तक पहुंचाने और सार्वजनिक भूमि को उसके मूल स्वरूप में बहाल कराने के निर्देश दिए गए थे। धारा 67 की कार्यवाही को कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद निर्धारित समय में पूरा करने पर भी न्यायालय ने विशेष जोर दिया।

*लेकिन सवाल यह है कि नगीना तहसील में इन निर्देशों का कितना पालन हुआ?*

क्या तालाबों और ग्राम सभा की जमीनों पर हुए सभी कथित कब्जों का निष्पक्ष सर्वे कराया गया? क्या प्रत्येक अतिक्रमणकर्ता के विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई की जा रही है? क्या ग्राम प्रधानों और लेखपालों से यह जवाब मांगा गया कि उन्होंने अतिक्रमण की सूचना समय पर क्यों नहीं दी? क्या आर.सी. फॉर्म-19 और संबंधित अभिलेखों की जांच की गई?

यदि किसी एक मामले में कार्रवाई होती है और अन्य कथित कब्जों पर चुप्पी साध ली जाती है, तो यह प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सरकारी जमीन किसी की निजी संपत्ति नहीं है और तालाबों पर कब्जे को नजरअंदाज करना जनहित के साथ खिलवाड़ है।

*अब केवल कागजी आदेश और औपचारिक जांच नहीं, बल्कि जमीन पर कार्रवाई चाहिए!*

जिलाधिकारी एवं संबंधित उच्चाधिकारियों से मांग है कि नगीना तहसील में हाईकोर्ट के आदेशों के अनुपालन की विशेष समीक्षा कराई जाए। सभी तालाबों और सार्वजनिक भूमि का राजस्व अभिलेखों के आधार पर सत्यापन हो, अतिक्रमण के मामलों में समान कार्रवाई की जाए तथा लापरवाही या मिलीभगत प्रमाणित होने पर संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।

*सबसे बड़ा सवाल—जब हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं, तो फिर सरकारी तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराने में देरी क्यों? क्या प्रशासन न्यायालय के आदेशों को गंभीरता से लागू कराएगा या सरकारी जमीन पर कब्जे यूं ही जारी रहेंगे?*

Director & chief

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