ऐसी बस… जिसके आगे चलता था लालटेन लेकर आदमी!
उत्तराखंड के परिवहन इतिहास का चौंकाने वाला सच

📰 उत्तराखंड अभी तक न्यूज़
📍 हरिद्वार | विशेष रिपोर्ट
🚨 ऐसी बस… जिसके आगे चलता था लालटेन लेकर आदमी!
🚍 उत्तराखंड के परिवहन इतिहास का चौंकाने वाला सच
आज जब उत्तराखंड की सड़कों पर आधुनिक, वातानुकूलित और हाईटेक बसें दौड़ रही हैं, तब शायद ही कोई कल्पना कर सके कि एक दौर ऐसा भी था जब बस के आगे-आगे एक आदमी लालटेन लेकर रास्ता दिखाता था। जी हां, यह कोई कहानी नहीं बल्कि उत्तराखंड के परिवहन इतिहास की सच्चाई है, जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।
🔥 1920 का खौफनाक सफर – जब सड़क से ज्यादा भरोसा लालटेन पर था
करीब 1920 के आसपास अल्मोड़ा से हल्द्वानी-रानीखेत मार्ग पर चलने वाली बसें इतनी असुरक्षित थीं कि उनके आगे एक व्यक्ति लालटेन लेकर चलता था। उसका काम था—अंधेरे और खतरनाक रास्तों में बस को दिशा देना।
👉 सोचिए, उस दौर में:
- बसों में हवा वाले टायर नहीं, बल्कि ठोस रबर के टायर होते थे
- सड़कें कच्ची और जोखिम भरी थीं
- रात का सफर मतलब जान जोखिम में डालना
⚙️ 1915 से शुरू हुआ था ये सफर – अंग्रेजों का प्रयोग या मजबूरी?
बताया जाता है कि 1915 में एक ब्रिटिश इंजीनियर ने डीजल और मिट्टी के तेल से चलने वाली बस तैयार की थी।
- एक बार में सिर्फ 20 यात्री बैठ सकते थे
- गति बेहद धीमी
- सफर बेहद जोखिम भरा
पहली बस सेवा काठगोदाम से नैनीताल के बीच शुरू हुई, फिर धीरे-धीरे हल्द्वानी से अल्मोड़ा तक पहुंची।
💼 निजी कंपनियों का दौर और फिर जबरदस्त टक्कर
अल्मोड़ा के लाला ललित प्रसाद ने “हिल मोटर ट्रांसपोर्ट” कंपनी शुरू की। इसके बाद:
- कई निजी कंपनियां मैदान में उतर आईं
- 1920 से 1938 के बीच 13 कंपनियां सक्रिय रहीं
- प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ी कि कई कंपनियां घाटे में डूब गईं
🇮🇳 आजादी के बाद बदली तस्वीर – लेकिन संघर्ष आसान नहीं था
1947 के बाद ही उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में सरकारी बस सेवाएं व्यवस्थित तरीके से शुरू हो सकीं।
- पहली सरकारी बस सेवा लखनऊ–बाराबंकी मार्ग पर शुरू हुई
- धीरे-धीरे कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र जुड़े
⚠️ आज की सुविधा बनाम तब की जंग
आज:
✔️ आरामदायक सीटें
✔️ तेज रफ्तार
✔️ सुरक्षित सड़कें
तब:
❌ लालटेन के सहारे सफर
❌ बिना हवा के टायर
❌ मौत के साए में यात्रा
💥 चौंकाने वाली बात – विदेश तक चलती थीं ये बसें!
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि उस दौर में भारत से लंदन तक भी बस सेवा के प्रयोग हुए थे। यह तथ्य जितना हैरान करता है, उतना ही उस समय की जिद और जुगाड़ को भी दिखाता है।
🗣️ सवाल उठता है…
क्या हम उस दौर की कठिनाइयों को समझ पा रहे हैं?
क्या आज की सुविधाओं की कद्र कर रहे हैं?
✍️ विशेष लेख: तैय्यब अली (स्वतंत्र लेखक)
📡 प्रस्तुति: उत्तराखंड अभी तक न्यूज़



