उत्तरप्रदेश

ग्राम प्रधान चुनिये गिरगिट नहीं।आखिर हाथ जोड़ गिड़गिड़ाकर वोट माँगने कि जरूरत ही क्यों पडती है?अवश्य जानिये।

रिपोर्ट ऋषि त्यागी

बिजनौर /ग्राम पंचायत चुनाव के दौरान क्यों ग्रामीणों के बिच हाथ जोड़ते है उम्मीदवार भूल जाते है रुतबा और दबंगई,यें एक बड़ा सवाल है। जिसे भोलेभाले ग्रामीणों को जानने कि आवश्यकता है।

 

ग्राम पंचायत चुनाव कि अगर बात करें तो यें चुनाव बड़े मजेदार साबित होते है। इन चुनावो में उम्मीदवारो द्वारा ग्रामवासियों के बिच अच्छी खासी नौटंकी देखने को मिलती है। और यें नौटंकी चुनाव होने से सिर्फ एक माह पहले आरम्भ होती है।

 यें उम्मीदवार एक महान समाजसेवी के जैसे मैदान में नजर आने लगते है। इतना ही नहीं कुछ लोग जो इनकी इस नौटंकी को समँझते है। वे अगर इन महान समाज सेवियों को गलती से कोई भद्दी गाली भी दे दें तो इनकी कुछ दिन कि यें महानता उसे भी हँसते हँसते कुबूल होती है। लेकिन अगर भूल से भी लोगो कि आँखों में भूल झोंक यें उम्मीदवार कहीं विजय हो जाते है तो फिर इन बुरा भला कहने वाले लोगो कि पांच सालो तक खैर नहीं।

 

मजे कि बात यें भी है कि जैसे ही ग्राम पंचायत चुनाव का परिणाम घोषित होता है उसी दिन यें नौटंकी समाप्त हो जाती है और इसके समाप्त होते ही उम्मीदवार फिर से उसी रुतबे और दबंगता के साथ ठीक उसी प्रकार नजर आता है जैसे पेड़ पर चढ़ा कोई गिरगिट रंग बदलता नजर आता है।

 

सावधान रहे ऐसे रंग बदलने वाले इन असामाजिक तत्वों से जो आपको बेवकूफ़ बनाकर वोट मांगते है। चुनावी मैदान में उतरने वाले यें लोग जो ग्रामवासियों के वोट पाने के लिए मुर्गे और शराब का साहरा लेते है यें ग्राम वासियों के लिए विकास का कार्य नहीं बल्कि पतन का कारण बनते है। ऐसा कोई गिरगिट अगर आपके दरवाजे पर वोट माँगने आये तो पहले उसके चरित्र के विषय में आंकलन अवश्य कर ले। क्योंकि ऐसे व्यक्ति को विजय बनाने के बाद फिर पांच वर्षो तक आपको उसके अधीन रहना होगा। समँझदारी इसी में है कि ऐसे व्यक्तियों से उनकी उपलब्धियाँ अवश्य पूछे। हाथ जोड़कर वोट माँगने कि आवश्यकता क्यों है? यह सवाल अवश्य करें। निसंदेह उनके पास आपके इस सवाल का उत्तर नहीं होगा। बस यही से आपकी समँझदारी और जिम्मेदारी का आंकलन भी हो जाएगा।

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